सीएजी ने जारी किया रेड अलर्ट
सीएजी ने जारी किया रेड अलर्ट
राज्य सरकार आर्थिक वेंटिलेटर पर
पेंशन पर आ सकता है गम्भीर संकट
महेश झालानी
राजस्थान सरकार ने अपने फालतू खर्चो पर रोक नही लगाई तो वह दिन दूर नही जब कर्मचारियों को देने के लिए एक धेला भी नही बचेगा । अन्नपूर्णा और मुफ्त दवा योजनाओं से तौबा करनी होगी । प्रदेश की वित्तीय स्थिति भयावह दौर से गुजर रही है । बावजूद इसके हुक्मरान आंखे मूंदे बैठे है ।
हकीकत यह है कि राजस्थान आज किसी सूखे, महामारी या युद्ध से नहीं जूझ रहा, बल्कि एक ऐसी आर्थिक बीमारी से घिर चुका है, जिसे खुद सरकार ने पाला है और जिसे विधायक चुपचाप बढ़ते देख रहे हैं। विधानसभा में बजट पर तालियाँ बजती हैं, योजनाओं के पोस्टर लगते हैं और घोषणाओं की बारिश होती है, लेकिन इन सबके पीछे जो सच्चाई छिपी है, वह यह है कि राजस्थान अब कर्ज पर सांस ले रहा है।
आज राज्य सरकार पर पांच लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है। यह कोई सूखा सरकारी आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की आर्थिक तबाही का साफ संकेत है। राज्य की कुल सालाना आमदनी के मुकाबले कर्ज का अनुपात खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है, लेकिन न सरकार बेचैन है और न जनप्रतिनिधि। सब कुछ सामान्य मान लिया गया है, जैसे यह कर्ज खुद-ब-खुद उतर जाएगा।
असल समस्या यह है कि राजस्थान अब विकास के लिए नहीं, बल्कि खर्च पूरे करने के लिए उधार ले रहा है। हर साल सरकार की कमाई से कहीं ज्यादा खर्च हो रहा है। नतीजा यह है कि घाटा बढ़ता जा रहा है और उस घाटे को भरने के लिए नया कर्ज लिया जा रहा है। यह वही स्थिति है जैसे कोई परिवार रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए साहूकार से उधार ले और फिर उस उधार का ब्याज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज ले। कुछ समय तक घर चलता रहता है, लेकिन एक दिन सब ढह जाता है।
सरकार ने वर्षों से “मुफ्त” शब्द को राजनीति का सबसे मजबूत हथियार बना लिया है। मुफ्त बिजली, मुफ्त दवाइयाँ, मुफ्त योजनाएँ यानी सब कुछ मुफ्त। लेकिन किसी ने यह सवाल पूछने की हिम्मत नहीं की कि यह मुफ्त आखिर किसकी कीमत पर है? सच्चाई यह है कि इन योजनाओं की कीमत आज कर्ज के रूप में और कल टैक्स, महंगी बिजली, महंगा पानी और बढ़े हुए शुल्क के रूप में जनता चुकाएगी। जो आज राहत बताई जा रही है, वही कल आर्थिक सजा बनकर लौटेगी।
राज्य की आमदनी बढ़ाने की दिशा में न तो ठोस नीति दिखती है और न इच्छाशक्ति। उद्योग निवेश सुस्त है, रोजगार के अवसर सीमित हैं और सरकार जमीन बेचकर बजट संतुलित करने की कोशिश कर रही है। यह विकास नहीं है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई परिवार अपने खेत और मकान बेचकर कुछ साल आराम से जी ले, लेकिन फिर उसके पास बेचने को कुछ न बचे। राजस्थान भी उसी रास्ते पर चल पड़ा है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अब राज्य का बड़ा हिस्सा कर्ज इसलिए लिया जा रहा है ताकि पुराने कर्ज का ब्याज और किश्त चुकाई जा सके। इसका मतलब साफ है कि राजस्थान आर्थिक रूप से आगे नहीं बढ़ रहा, बल्कि एक ही जगह खड़ा रहकर सिर्फ बोझ संभालने की कोशिश कर रहा है। ब्याज पर ब्याज चढ़ रहा है और विकास के लिए उपलब्ध पैसा लगातार सिकुड़ता जा रहा है।
विधानसभा में बैठे विधायकों को यह समझना होगा कि वे केवल अपने कार्यकाल के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आज वे जिन योजनाओं पर ताली बजा रहे हैं, उनका बिल आने वाले दस–पंद्रह साल तक राजस्थान चुकाएगा। कल जब कर्मचारियों की तनख्वाह, पेंशन या बुनियादी सेवाओं पर संकट आएगा, तब यह कहना आसान नहीं होगा कि “हमें पता नहीं था”। आंकड़े सामने हैं, चेतावनियाँ साफ हैं, फिर भी चुप्पी साध ली गई है।
अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में राजस्थान का कर्ज और बढ़ेगा, ब्याज पर हजारों करोड़ रुपये सालाना खर्च होंगे और सरकार के पास विकास के लिए पैसा नाममात्र का बचेगा। ऐसे में ज्यादा टैक्स, ज्यादा शुल्क, ज्यादा महंगाई और फिर नया कर्ज। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जो धीरे-धीरे पूरे राज्य को जकड़ लेता है।
आज भी वक्त है कि सरकार और विधायक आत्ममंथन करें। मुफ्त योजनाओं की ईमानदार समीक्षा हो, आमदनी बढ़ाने पर गंभीर काम हो और खर्च से पहले कमाई को प्राथमिकता दी जाए। लेकिन अगर सत्ता इसी भ्रम में रही कि सब ठीक है, तो याद रखना होगा कि इतिहास में आर्थिक संकट बिना शोर किए आते हैं और जब आते हैं, तब संभलने का मौका नहीं देते।
राजस्थान की अर्थव्यवस्था आज चेतावनी दे रही है। सवाल यह है कि सरकार और विधायक इसे सुनना चाहते हैं या नहीं।
यह तथ्य भी गौरतलब है कि।राज्य की सालाना आमदनी के मुकाबले यह कर्ज अब लगभग 36 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जिसे वित्तीय जानकार सुरक्षित नहीं मानते। इस कर्ज का सबसे खतरनाक पहलू उसका ब्याज है। राजस्थान सरकार को हर साल सिर्फ ब्याज चुकाने में ही 50 से 55 हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। यानी सरकार जो भी टैक्स और राजस्व इकट्ठा करती है, उसका बड़ा हिस्सा स्कूल, अस्पताल, सड़क या रोजगार पर नहीं, बल्कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ब्याज देने में चला जाता है। यह वही स्थिति है जिसमें घर का मुखिया पहले साहूकार का पैसा चुकाता है और फिर देखता है कि घर के लिए कुछ बचा या नहीं।
चिंता की बात यह है कि अब सरकार नया कर्ज इसलिए भी ले रही है ताकि पुराने कर्ज की किश्त और ब्याज समय पर चुकाया जा सके। साफ शब्दों में कहें तो राजस्थान कर्ज चुकाने के लिए कर्ज ले रहा है। यह आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का संकेत है।
इस हालात पर देश की सर्वोच्च लेखा जांच संस्था सीएजी ने भी खुली चेतावनी दी है। सीएजी।ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि राजस्थान में कर्ज और ब्याज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है और सरकार की राजस्व स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि वह लंबे समय तक इस दबाव को सह सके। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि राज्य की बड़ी राशि ब्याज और कर्ज चुकाने में फंस जाने से विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधन लगातार घट रहे हैं।
सीएजी ने यह भी चेताया है कि मुफ्त और सब्सिडी आधारित योजनाओं पर भारी खर्च, बिना स्थायी आय स्रोत तैयार किए, राज्य की वित्तीय सेहत को कमजोर कर रहा है। रिपोर्ट के शब्दों में, अगर खर्च और आमदनी के बीच यह असंतुलन यूं ही बना रहा तो आने वाले वर्षों में राजस्थान की वित्तीय स्थिति और बिगड़ सकती है। सबसे गंभीर संकेत यह है कि सरकार के पास अब अपनी कमाई से खर्च चलाने की गुंजाइश सीमित होती जा रही है।
आज की तारीख में हालात यह हैं कि सरकार जो कर्ज ले रही है, उसका बड़ा हिस्सा जनता के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में नहीं, बल्कि पुराने कर्ज के बोझ को संभालने में खर्च हो रहा है। यह भविष्य की पीढ़ियों पर सीधा बोझ डालने जैसा है। विधानसभा में बैठे विधायकों और सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि कर्ज कोई कागजी आंकड़ा नहीं होता। यह वह दबाव है जो कल को कर्मचारियों की तनख्वाह, पेंशन, विकास योजनाओं और बुनियादी सेवाओं पर सीधा असर डालता है।
सीएजी की चेतावनी को नजरअंदाज करना ऐसा ही है जैसे घर की छत में दरार दिखने के बावजूद उसे रंग-पुताई से छिपा देना। राजस्थान आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां अगर वित्तीय अनुशासन, खर्च पर नियंत्रण और आमदनी बढ़ाने की ठोस नीति नहीं बनी, तो आने वाला समय सिर्फ कर्ज और ब्याज के नाम लिखा जाएगा। सवाल यह नहीं है कि आज सरकार कैसे चल रही है, सवाल यह है कि कल राजस्थान कैसे चलेगा।
कर्ज का पहाड़
आज का कुल कर्ज: ₹5,79,000 करोड़ से अधिक।
प्रति व्यक्ति बोझ:
प्रदेश के हर नागरिक पर लगभग ₹75,000 का कर्ज।
चिंता का विषय:
पिछले 5 वर्षों में कर्ज की दर में 80 फीसदी की छलांग।
सुझाव: एक आदमी जो अपनी पीठ पर '5.79 लाख करोड़' का पत्थर उठाकर पहाड़ चढ़ने की कोशिश कर रहा है।
कहाँ जा रहा है आपका पैसा?
ब्याज भुगतान:
50,000 - 55,000 करोड़ सालाना।
कड़वा सच:
राजस्थान अपनी कुल कमाई का 22 फीसदी हिस्सा केवल कर्ज का ब्याज चुकाने में गँवा देता है।
नतीजा:
विकास कार्यों (सड़क, स्कूल, अस्पताल) के लिए फंड में 30 फीसदी की भारी कटौती।
सुझाव: एक बाल्टी (राजस्व) जिसमें नीचे 'ब्याज' नाम का एक बड़ा छेद है जिससे पानी बाहर निकल रहा है।
सीएजी की रेड सिग्नल चेतावनी
चेतावनी 1:
राज्य अब 'पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज' ले रहा है ।
चेतावनी 2:
राजस्व प्राप्ति और खर्च के बीच का अंतर खतरनाक स्तर पर।
चेतावनी 3:
बिना स्थायी आय के 'मुफ्त योजनाएं' वित्तीय आत्महत्या के समान।
भविष्य का खतरा
वेतन व पेंशन संकट:
यदि यही रफ्तार रही तो 2027-28 तक कर्मचारियों के वेतन के लिए भी उधार लेना पड़ेगा।
संपत्ति की सेल:
सरकार 'जमीन बेचकर बजट संतुलित' करने की आत्मघाती नीति अपना रही है।,,.,

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